NCERT Solutions for Class 9 Hindi (गंगा) Latest 2026–27 Chapter wise

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NCERT Solutions for Class 9 Hindi (गंगा) Latest 2026–27 Chapter wise

NCERT Solutions for Class 9 Hindi provide detailed chapter-wise answers for the main book titled गंगा. Covering all 12 chapters from the latest 2026 textbook, these NCERT solutions for Class 9 help students understand prose and poetry more effectively. Each answer is explained in a clear and simple language to improve Hindi writing skills.

Whether for CBSE Board Class 9 school tests, exams, homework or revision, these NCERT Solutions Hindi by Shiksha Nation help students gain better understanding and develop better control over the language.

Latest NCERT Solutions for Class 9 Hindi Overview

गद्य - खंड

S.No.Chapter Name & Topic
1Chapter 1 - दो बैलों की कथा
2Chapter 2 - क्या लिखूँ?
3Chapter 3 - संवादहीन 
4Chapter 4 - ऐसी भी बातें होती हैं – लता मंगेशकर से साक्षात्कार 
5Chapter 5 - आखिरी चट्टान तक
6Chapter 6 - रीढ़ की हड्डी
7Chapter 7 - मैं और मेरा देश

काव्य - खंड

8Chapter 8 - पद 
9Chapter 9 - राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद
10Chapter 10 - भारति, जय, विजय करे! 
11Chapter 11 - झाँसी की रानी
12Chapter 12 - घर की याद

Chapter-wise NCERT Solutions for Class 9 Hindi Overview

पाठ 1 - दो बैलों की कथा (कहानी) 

यह पाठ हिंदी कथा-साहित्य के सम्राट प्रेमचंद द्वारा रचित एक कालजयी कहानी पर आधारित है और नई गंगा पाठ्यपुस्तक का पहला अध्याय है। छात्र इसमें जानते हैं कि कैसे हीरा और मोती नामक दो बैलों की अटूट मित्रता और स्वामिभक्ति के माध्यम से प्रेमचंद ने मानवीय संबंधों, पराधीनता के विरुद्ध संघर्ष और स्वतंत्रता की आकांक्षा को अत्यंत मार्मिक रूप में प्रस्तुत किया है।

यह पाठ बताता है कि कैसे दोनों बैल अपने मालिक से बिछड़ने के बाद भी एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ते और अपनी पराधीनता के विरुद्ध बार-बार विद्रोह करते हैं। इसमें जानवरों के पात्रों के माध्यम से औपनिवेशिक दासता और भारतीय किसान की पीड़ा का जो रूपक खींचा गया है, वह इस कहानी को केवल पशु-कथा नहीं बल्कि एक गहरी सामाजिक-राजनीतिक रचना बनाता है। छात्र मित्रता, स्वतंत्रता की चाहत, स्वाभिमान और बलिदान के मूल्यों के विषय में सीखते हैं।

पाठ 2 - क्या लिखूँ? (निबंध) 

यह पाठ हिंदी के सुप्रसिद्ध निबंधकार पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी द्वारा लिखित एक विनोदपूर्ण और आत्मचिंतनशील निबंध पर आधारित है। छात्र इसमें जानते हैं कि कैसे लेखक एक लेखक की उस परिचित मनोदशा का हास्यप्रद चित्रण करते हैं जब वह लिखने बैठता है पर कोई विषय नहीं सूझता, हर विषय या तो बहुत घिसा-पिटा लगता है या बहुत जटिल।

यह पाठ बताता है कि लेखक अपनी इस उलझन को इतनी सहजता और विनोद के साथ व्यक्त करते हैं कि पाठक को हँसते-हँसते लेखन की प्रक्रिया, रचनात्मकता की बाधाओं और सृजन के मनोविज्ञान की गहरी समझ मिल जाती है। इसमें शुक्ल-युगीन हिंदी गद्य की सुसंस्कृत और परिष्कृत शैली का सुंदर उदाहरण मिलता है। छात्र निबंध-विधा, रचनात्मक प्रक्रिया की चुनौतियों और सहज हास्य के माध्यम से आत्म-व्यंग्य की कला के विषय में सीखते हैं।

पाठ 3 - संवादहीन (कहानी) 

यह पाठ हिंदी के प्रमुख कथाकार शेखर जोशी द्वारा लिखित एक संवेदनशील और विचारोत्तेजक कहानी पर आधारित है जो आधुनिक जीवन की एक गहरी विडंबना को उजागर करती है। छात्र इसमें जानते हैं कि कैसे भरे-पूरे परिवार और भीड़ भरे शहरी जीवन के बावजूद लोग एक-दूसरे से भावनात्मक रूप से कटे हुए रहते हैं और सच्चा संवाद नहीं कर पाते।

यह पाठ बताता है कि बाहर से सामान्य दिखने वाले संबंध भीतर से कितने खोखले और संवादहीन हो सकते हैं, जहाँ शब्द तो बोले जाते हैं पर मन की बात कभी नहीं कही जाती। इसमें पहाड़ी जन-जीवन की पृष्ठभूमि और शेखर जोशी की सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक दृष्टि का सुंदर परिचय मिलता है। छात्र मानवीय संबंधों की जटिलता, आधुनिक एकाकीपन और वास्तविक संवाद की आवश्यकता के विषय में सीखते हैं।

पाठ 4 - ऐसी भी बातें होती हैं – लता मंगेशकर से साक्षात्कार (साक्षात्कार) 

यह पाठ प्रसिद्ध लेखक और संगीत-विद्वान यतींद्र मिश्र द्वारा भारत-कोकिला लता मंगेशकर के साथ लिए गए एक अत्यंत दुर्लभ और जीवंत साक्षात्कार पर आधारित है। छात्र इसमें जानते हैं कि कैसे लता मंगेशकर अपने संगीत-जीवन की शुरुआत, साधना के वर्षों, गायकी के प्रति अपनी गहरी प्रतिबद्धता और उन छोटी-छोटी मानवीय घटनाओं के बारे में बताती हैं जिन्होंने उनके जीवन और कला को आकार दिया।

यह पाठ बताता है कि किसी भी कला में शिखर तक पहुँचने के लिए केवल प्रतिभा नहीं बल्कि दशकों की अनवरत साधना, अनुशासन और अपने क्षेत्र के प्रति असीम श्रद्धा की आवश्यकता होती है। इसमें साक्षात्कार-विधा की भाषाई और संरचनात्मक विशेषताओं का भी व्यावहारिक परिचय होता है। छात्र भारतीय संगीत की समृद्ध परंपरा, कला के प्रति समर्पण और साक्षात्कार-लेखन की विधा के विषय में सीखते हैं।

पाठ 5 - आखिरी चट्टान तक (यात्रा वृत्तांत) 

यह पाठ हिंदी के सुप्रसिद्ध नाटककार और लेखक मोहन राकेश द्वारा लिखित एक रोमांचक और दार्शनिक यात्रा वृत्तांत पर आधारित है। छात्र इसमें जानते हैं कि कैसे लेखक एक दुर्गम पर्वतीय मार्ग पर यात्रा करते हुए केवल भौगोलिक दूरियाँ नहीं, बल्कि मन की सीमाओं और मनुष्य की आत्म-जिजीविषा को भी नापते हैं।

यह पाठ बताता है कि आखिरी चट्टान तक पहुँचने की जिद केवल एक भौतिक लक्ष्य नहीं है, बल्कि यह उस मानवीय प्रवृत्ति का प्रतीक है जो हर बाधा के सामने हार मानने से इनकार करती है और अपनी सीमाओं को बार-बार आगे धकेलती रहती है। इसमें मोहन राकेश की चित्रात्मक भाषा और गहरी अन्तर्दृष्टि के माध्यम से प्रकृति और मनुष्य के संबंध का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण है। छात्र साहस, दृढ़-संकल्प, यात्रा-साहित्य की विधा और जीवन में सतत प्रयास के महत्व के विषय में सीखते हैं।

पाठ 6 - रीढ़ की हड्डी (एकांकी) 

यह पाठ हिंदी के प्रतिष्ठित नाटककार जगदीशचंद्र माथुर द्वारा रचित एक सशक्त एकांकी पर आधारित है जो पुरानी गंगा पाठ्यपुस्तक से नई गंगा में भी स्थान पाने वाला एकमात्र अध्याय है। छात्र इसमें जानते हैं कि कैसे एक सामान्य विवाह-दर्शन के प्रसंग के माध्यम से लेखक ने स्त्री-शिक्षा, सामाजिक पाखंड और लड़कियों के साथ होने वाले भेदभाव पर एक तीक्ष्ण व्यंग्य प्रस्तुत किया है।

यह पाठ बताता है कि कैसे उमा नामक शिक्षित युवती की आत्म-सम्मान और स्वाभिमान की भावना एकांकी के अंत में उन पुरुषों को आईना दिखाती है जो स्त्री को केवल एक वस्तु की तरह देखते हैं। इसमें 'रीढ़ की हड्डी' का शीर्षक-प्रतीक अत्यंत सार्थक है, जिस समाज में स्त्री को आत्मसम्मान के साथ खड़े होने का हक न हो, उसकी रीढ़ की हड्डी ही कमज़ोर है। छात्र स्त्री-सशक्तिकरण, सामाजिक पाखंड की आलोचना, एकांकी विधा और स्वाभिमान के मूल्य के विषय में सीखते हैं।

पाठ 7 - मैं और मेरा देश (निबंध) 

यह पाठ हिंदी के प्रखर निबंधकार कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' द्वारा लिखित एक भावपूर्ण और विचारोत्तेजक निबंध पर आधारित है। छात्र इसमें जानते हैं कि कैसे लेखक एक व्यक्ति और उसके देश के बीच के गहरे और जटिल संबंध को व्यक्तिगत अनुभवों की रोशनी में परखते हैं, जहाँ देश-प्रेम केवल नारे लगाना नहीं, बल्कि अपने दायित्वों को निभाना और आत्म-शोधन करना है।

यह पाठ बताता है कि हम अपने देश की कमियों की शिकायत करते हैं, पर क्या हम स्वयं उन कमियों से मुक्त हैं, यह प्रश्न लेखक हर पाठक के सामने रखते हैं। इसमें 'प्रभाकर' की ओजस्वी और सहज शैली में राष्ट्रीय पहचान, नागरिक जिम्मेदारी और सामाजिक परिवर्तन में व्यक्ति की भूमिका पर गहरा विमर्श है। छात्र नागरिक-बोध, आत्म-मूल्यांकन, राष्ट्र-प्रेम की व्यावहारिक परिभाषा और हिंदी निबंध परंपरा के विषय में सीखते हैं।

पाठ 8 - पद (भक्ति पद) 

यह पाठ मध्यकालीन भक्ति-आंदोलन के महान संत कवि रैदास (रविदास) द्वारा रचित पदों का संकलन है, जो निर्गुण भक्ति की अनुपम परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं। छात्र इसमें जानते हैं कि कैसे रैदास ने जाति-पाँति और सामाजिक भेदभाव से परे जाकर ईश्वर से एकात्म होने की गहरी आकांक्षा को अत्यंत सरल और मर्मस्पर्शी भाषा में व्यक्त किया है।

यह पाठ बताता है कि रैदास के पदों में भक्ति केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि एक ऐसी आंतरिक यात्रा है जो समाज की हर बाधा को तोड़कर आत्मा को उसके स्रोत से जोड़ती है। इसमें 'ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करै' और 'मन चंगा तो कठौती में गंगा' जैसी उक्तियों की दार्शनिक गहराई का परिचय मिलता है। छात्र भक्ति-साहित्य की निर्गुण धारा, सामाजिक समता का संदेश, ब्रजभाषा के काव्य-सौंदर्य और आत्मिक शुद्धता के विषय में सीखते हैं।

पाठ 9 - राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद (प्रसंग) 

यह पाठ हिंदी के महाकवि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के बालकांड का एक प्रसिद्ध प्रसंग है जिसमें सीता-स्वयंवर के अवसर पर शिव-धनुष टूटने के बाद परशुराम, श्रीराम और लक्ष्मण के बीच हुए नाटकीय और रोमांचक संवाद का वर्णन है। छात्र इसमें जानते हैं कि कैसे परशुराम का अहंकारपूर्ण क्रोध, लक्ष्मण का निर्भीक और व्यंग्यपूर्ण उत्तर और श्रीराम की शांत-मर्यादित वाणी, तीनों मिलकर एक ऐसा संवाद-काव्य बनाते हैं जो सदियों बाद भी अप्रतिम रोमांच देता है।

यह पाठ बताता है कि लक्ष्मण के संवाद जहाँ वीर-रस की पराकाष्ठा हैं, वहीं श्रीराम की विनम्रता मर्यादा-पुरुषोत्तम के चरित्र की सच्ची पहचान है। इसमें अवधी भाषा के माधुर्य, चौपाई-दोहे के छंद-विधान और तुलसीदास की वर्णन-शक्ति का भी समुचित परिचय मिलता है। छात्र वीर रस, मर्यादा-बोध, रामायण की साहित्यिक परंपरा और क्लासिकल हिंदी काव्य के विषय में सीखते हैं।

पाठ 10 - भारति, जय, विजय करे! (कविता) 

यह पाठ हिंदी साहित्य के छायावादी युग के महान स्तंभ सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित एक ओजस्वी राष्ट्रगान-शैली की कविता पर आधारित है। छात्र इसमें जानते हैं कि कैसे निराला ने भारत माता की महिमा, उसकी सांस्कृतिक विरासत और उसके जन-मानस की अदम्य शक्ति को बुलंद स्वर में गाया है।

यह पाठ बताता है कि निराला की यह कविता केवल देशभक्ति का उद्घोष नहीं बल्कि भारत की उस आत्मा का गान है जो सदियों के संघर्ष के बाद भी अपनी जड़ों से जुड़ी और अपने स्वत्व को लेकर सचेत है। इसमें निराला की मुक्त-छंद शैली, उनके भाषाई ओज और भव्य काव्य-बिंबों का परिचय भी मिलता है जो उन्हें छायावाद का सबसे विद्रोही और शक्तिशाली स्वर बनाते हैं। छात्र देशभक्ति काव्य, छायावाद की विशेषताएँ, मुक्त-छंद की संरचना और भारतीय राष्ट्रीय चेतना के विषय में सीखते हैं।

पाठ 11 - झाँसी की रानी (कविता) 

यह पाठ हिंदी की अमर कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचित हिंदी साहित्य की सर्वाधिक लोकप्रिय और स्मृति-बद्ध देशभक्ति कविताओं में से एक है। छात्र इसमें जानते हैं कि कैसे कवयित्री ने वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई के जीवन-संघर्ष, उनकी तलवारबाज़ी, अंग्रेज़ों के विरुद्ध उनकी निर्भीक लड़ाई और अंततः 1858 में ग्वालियर के युद्ध में अपने प्राणों की आहुति देने की गाथा को ऐसी ललकारती भाषा में गाया है जो पाठक के रोम-रोम में देशप्रेम की ज्वाला जला देती है।

यह पाठ बताता है कि 'बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी', यह पंक्तियाँ महज़ काव्य नहीं बल्कि इतिहास की एक अमर धरोहर हैं। इसमें कविता की लयात्मक संरचना, इतिहास और काव्य के संगम और नारी-वीरता के उद्दात्त चित्रण का अध्ययन किया जाता है। छात्र वीर रस, ऐतिहासिक काव्य-परंपरा, स्त्री-शक्ति और राष्ट्रीय स्वतंत्रता-संग्राम के विषय में सीखते हैं।

पाठ 12 - घर की याद (कविता) 

यह पाठ हिंदी के प्रमुख कवि भवानीप्रसाद मिश्र द्वारा रचित एक अत्यंत भावपूर्ण और व्यक्तिगत कविता पर आधारित है जो स्वतंत्रता-आंदोलन के दौरान जेल में लिखी गई थी। छात्र इसमें जानते हैं कि कैसे कवि जेल की एकाकी रातों में वर्षा की बूँदों को देखते हुए अपने घर, परिवार और माँ की याद में डूब जाते हैं और इस गहरी व्यक्तिगत पीड़ा को अत्यंत कोमल और मार्मिक शब्दों में व्यक्त करते हैं।

यह पाठ बताता है कि घर की याद केवल एक स्थान की चाहत नहीं बल्कि उन सब अपनों की याद है जो जीवन को अर्थ देते हैं, और यह कविता पाठक को यह एहसास दिलाती है कि देश के लिए बलिदान का मतलब केवल वीरता नहीं, बल्कि उतनी ही बड़ी भावनात्मक कुर्बानी भी है। इसमें गाँधी युगीन हिंदी कविता की सहज भाषा, देशभक्ति और व्यक्तिगत वेदना के अनूठे संगम और वर्षा-बिंब के काव्यात्मक प्रयोग का सुंदर विश्लेषण होता है। छात्र करुण रस, व्यक्तिगत और राष्ट्रीय भावनाओं का द्वंद्व, स्वतंत्रता-संग्राम के साहित्य और पारिवारिक प्रेम की अभिव्यक्ति के विषय में सीखते हैं।

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