Shiksha Nation provides Class 10 Hindi NCERT Solutions with complete chapter-wise answers for all the textbooks. CBSE Board offers two different courses for Class 10 Hindi, Course A and Course B. Course A is for students who study Hindi as their first language and includes the textbooks क्षितिज भाग 2 and कृतिका भाग 2.
Course B is for students who study Hindi as their second language and includes स्पर्श भाग 2 and संचयन भाग 2. Students often find it difficult to write answers in Hindi and these NCERT solutions for Class 10 help them understand both prose and poetry more effectively. Each answer is explained clearly to improve comprehension and writing skills in Hindi.
NCERT Solutions for Class 10 Hindi Chapters Links
Hindi Course A:
क्षितिज भाग 2 - काव्य - खंड
| S.No. | Chapter Name & Topic |
| 1 | Chapter 1 - पद |
| 2 | Chapter 2 - राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद |
| 3 | Chapter 3 - आत्मकथ्य |
| 4 | Chapter 4 - उत्साह और अट नहीं रही |
| 5 | Chapter 5 - यह दंतुरहित मुस्कान और फसल |
| 6 | Chapter 6 - संगतकार |
गद्य - खंड
| 7 | Chapter 7 - नेताजी का चश्मा |
| 8 | Chapter 8 - बालगोबिन भगत |
| 9 | Chapter 9 - लखनवी अंदाज़ |
| 10 | Chapter 10 - एक कहानी यह भी |
| 11 | Chapter 11 - नौबतखाने में इबादत |
| 12 | Chapter 12 - संस्कृति |
कृतिका भाग 2
| S.No. | Chapter Name & Topic |
| 1 | Chapter 1 - माता का आँचल |
| 2 | Chapter 2 - साना-साना हाथ जोड़ि… |
| 3 | Chapter 3 - मैं क्यों लिखता हूँ? |
Hindi Course B:
स्पर्श भाग 2
काव्य - खंड
| S.No. | Chapter Name & Topic |
| 1 | Chapter 1 - साखी |
| 2 | Chapter 2 - पद |
| 3 | Chapter 3 - मनुष्यता |
| 4 | Chapter 4 - पर्वत प्रदेश में पावस |
| 5 | Chapter 5 - तोप |
| 6 | Chapter 6 - कर चले हम फ़िदा |
| 7 | Chapter 7 - आत्मत्राण |
गद्य - खंड
| 8 | Chapter 8 - बड़े भाई साहब |
| 9 | Chapter 9 - डायरी का एक पन्ना |
| 10 | Chapter 10 - तताँरा-वामीरो कथा |
| 11 | Chapter 11 - तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र |
| 12 | Chapter 12 - अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले |
| 13 | Chapter 13 - पतझर में टूटी पत्तियाँ |
| 14 | Chapter 14 - कारतूस |
संचयन भाग 2
| S.No. | Chapter Name & Topic |
| 1 | Chapter 1 - हरिहर काका |
| 2 | Chapter 2 - सपनों के से दिन |
| 3 | Chapter 3 - टोपी शुक्ला |
Chapter-wise NCERT Solutions for Class 10 Hindi
Hindi Course A:
क्षितिज भाग 2
पाठ 1 - पद (सूरदास)
यह पाठ भक्तिकाल के महान कवि सूरदास द्वारा रचित पदों का संकलन है, जो वात्सल्य और विरह दोनों रसों के अद्वितीय चित्रण के लिए जाने जाते हैं। छात्र इसमें जानते हैं कि कैसे सूरदास ने गोपियों के माध्यम से उद्धव द्वारा दिए गए ज्ञान-योग के उपदेश को अस्वीकार करते हुए श्रीकृष्ण की सगुण भक्ति की श्रेष्ठता को प्रतिपादित किया है। यह पाठ बताता है कि गोपियों के व्यंग्य-वचनों में ब्रजभाषा की मधुरता और प्रेम-भक्ति की दार्शनिक गहराई का अनूठा संगम है। इसमें निर्गुण-निराकार ज्ञान और सगुण-साकार भक्ति के बीच के अंतर को गोपियों की सहज और निश्छल भाषा में बड़े प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है। छात्र भक्तिकाल की सगुण-भक्ति धारा, वात्सल्य रस, ब्रजभाषा के काव्य-सौंदर्य और सूरदास के काव्य में प्रेम-भक्ति की अनुपम अभिव्यक्ति के विषय में सीखते हैं।
पाठ 2 - राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद (तुलसीदास)
यह पाठ महाकवि तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के बालकांड से लिया गया वह अत्यंत प्रसिद्ध और नाटकीय प्रसंग है जिसमें सीता-स्वयंवर में शिव-धनुष भंग होने के बाद परशुराम, श्रीराम और लक्ष्मण के बीच हुए रोमांचकारी संवाद का वर्णन है। छात्र इसमें जानते हैं कि कैसे क्रोधित परशुराम के अहंकारपूर्ण वचनों के सामने लक्ष्मण का निर्भीक और तीखा व्यंग्य, और श्रीराम की विनम्र तथा मर्यादित वाणी एक ऐसा काव्य-नाटक रचते हैं जो सदियों से पाठकों को रोमांचित करता आया है। यह पाठ बताता है कि इस संवाद में परशुराम का वीर-अहंकार, लक्ष्मण का निर्भीक वीरत्व और श्रीराम की लोकोत्तर मर्यादा तीन अलग-अलग व्यक्तित्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसमें अवधी भाषा की मिठास और चौपाई-दोहे के छंद-विधान का भी परिचय मिलता है। छात्र वीर रस, मर्यादा-बोध, भक्तिकालीन महाकाव्य-परंपरा और काव्य-भाषा की अनेक शैलियों के विषय में सीखते हैं।
पाठ 3 - आत्मकथ्य (जयशंकर प्रसाद)
यह पाठ हिंदी के छायावादी युग के महान कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित एक अत्यंत विशिष्ट कविता पर आधारित है जो आत्मकथा लिखने के आग्रह को विनम्रतापूर्वक अस्वीकार करते हुए आत्म-प्रकाशन की सीमाओं पर गहरा विचार करती है। छात्र इसमें जानते हैं कि जब मुंशी प्रेमचंद ने 'हंस' पत्रिका के लिए उनसे आत्मकथा लिखने का आग्रह किया तो प्रसाद जी ने यह कविता लिख दी जिसमें वे अपने जीवन की विफलताओं और प्रेम में मिली निराशा को बेहद संयत भाषा में व्यक्त करते हैं। यह पाठ बताता है कि इस विनम्रता के आवरण में एक गहरी व्यक्तिगत पीड़ा समाहित है जो छायावाद की सूक्ष्म भावनात्मकता का उत्कृष्ट उदाहरण है। छात्र छायावादी कविता की विशेषताएँ, व्यक्तिगत अभिव्यक्ति और काव्य-भाषा की संयमित मार्मिकता के विषय में सीखते हैं।
पाठ 4 - उत्साह और अट नहीं रही (सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला')
यह पाठ छायावाद के सबसे विद्रोही और ओजस्वी कवि निराला की दो कविताओं पर आधारित है जो दो बिल्कुल भिन्न भावों को एक ही तीव्रता से अभिव्यक्त करती हैं। छात्र इसमें जानते हैं कि 'उत्साह' में कवि बादल को क्रांति और नवनिर्माण के प्रतीक के रूप में संबोधित करते हैं जहाँ बादल केवल वर्षा नहीं बल्कि पीड़ित मानवता के लिए परिवर्तन का संदेश लाता है। यह पाठ बताता है कि 'अट नहीं रही' में निराला ने फाल्गुन मास की उन्मुक्त फागुनी हवाओं का ऐसा अद्भुत शब्द-चित्र खींचा है कि वसंत का सौंदर्य मानो उमड़कर बाहर आ रहा है और किसी भी सीमा में समा नहीं रहा। इसमें मुक्त छंद का प्रयोग और निराला की विशिष्ट काव्य-शैली का परिचय मिलता है। छात्र छायावादी ओज, प्रकृति-चित्रण, मुक्त छंद की संरचना और काव्य में प्रतीकात्मकता के विषय में सीखते हैं।
पाठ 5 - यह दंतुरहित मुस्कान और फसल (नागार्जुन)
यह पाठ हिंदी के प्रगतिशील जनकवि नागार्जुन की दो कविताओं पर आधारित है। छात्र इसमें जानते हैं कि 'यह दंतुरहित मुस्कान' में कवि एक दूधमुँहे शिशु की दंतहीन मुस्कान को देखकर उसमें ऐसी शक्ति पाता है जो पत्थर को भी पिघला दे, यह वात्सल्य रस की आधुनिक अभिव्यक्ति का अनुपम उदाहरण है। यह पाठ बताता है कि 'फसल' में नागार्जुन किसान के परिश्रम, नदियों के जल, पवन की शक्ति और मिट्टी के उपकार को मिलाकर फसल की रचना को श्रम और प्रकृति के सामूहिक योगदान के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इसमें नागार्जुन की सहज, ठेठ और जन-जीवन से जुड़ी काव्य-भाषा का परिचय होता है। छात्र प्रगतिशील काव्यधारा, वात्सल्य रस, कृषि-संस्कृति का सम्मान और आधुनिक हिंदी कविता की भाषाई सादगी के विषय में सीखते हैं।
पाठ 6 - संगतकार (मंगलेश डबराल)
यह पाठ समकालीन हिंदी कविता के प्रतिष्ठित कवि मंगलेश डबराल द्वारा रचित एक अत्यंत विचारोत्तेजक कविता पर आधारित है। छात्र इसमें जानते हैं कि कैसे संगीत के मंच पर मुख्य गायक की आवाज़ को संभालने वाला संगतकार जान-बूझकर अपनी आवाज़ कभी भी मुख्य गायक से ऊँची नहीं उठाता, भले ही उसमें उतनी ही प्रतिभा क्यों न हो। यह पाठ बताता है कि संगतकार की यह विनम्रता कमज़ोरी नहीं बल्कि एक महान नैतिक शक्ति है और कविता एक व्यापक सामाजिक रूपक बन जाती है जो जीवन के हर क्षेत्र में उन गुमनाम लोगों के योगदान को रेखांकित करती है। छात्र समकालीन काव्य-बोध, निःस्वार्थ सेवा और कविता में रूपक-प्रयोग की शक्ति के विषय में सीखते हैं।
पाठ 7 - नेताजी का चश्मा (स्वयं प्रकाश)
यह पाठ हिंदी के लोकप्रिय कथाकार स्वयं प्रकाश द्वारा लिखित एक मार्मिक देशभक्ति-भावना से ओतप्रोत कहानी पर आधारित है। छात्र इसमें जानते हैं कि कैसे एक छोटे-से कस्बे में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की प्रतिमा पर कैप्टन नाम का एक बूढ़ा चश्मे वाला हर बार असली चश्मा लगा देता है, और जब कभी कोई उसका चश्मा खरीद लेता है तो वह दूसरा लगा देता है। यह पाठ बताता है कि इस साधारण काम में उसकी असाधारण देशभक्ति समाहित है और कहानी का अंत बेहद भावुक है जब बच्चे स्वयं ही सरकंडे का चश्मा बनाकर प्रतिमा पर लगा देते हैं। छात्र सच्ची देशभक्ति की परिभाषा, निस्वार्थ कर्तव्य-भाव और नागरिक-चेतना के विषय में सीखते हैं।
पाठ 8 - बालगोबिन भगत (रामवृक्ष बेनीपुरी)
यह पाठ रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा लिखित एक अविस्मरणीय व्यक्तित्व-चित्रण पर आधारित है। छात्र इसमें जानते हैं कि बालगोबिन भगत एक ऐसे किसान-संत हैं जो सब कुछ कबीर के दर्शन पर चलाते हैं, अपनी फसल पहले कबीरपंथी मठ में जमा करते हैं और प्रसाद-रूप में जो मिलता है उसी से गुज़ारा करते हैं। यह पाठ बताता है कि जब उनके इकलौते पुत्र की मृत्यु होती है तो बालगोबिन भगत स्वयं गाते हैं और बहू को पुनर्विवाह का आदेश देते हैं, यह उनका वैराग्य नहीं बल्कि एक जीवंत दार्शनिक चेतना है। इसमें बेनीपुरी की ललित गद्य-शैली का भव्य परिचय मिलता है। छात्र रेखाचित्र विधा, कबीरपंथी जीवन-दर्शन और वैराग्य के विषय में सीखते हैं।
पाठ 9 - लखनवी अंदाज़ (यशपाल)
यह पाठ हिंदी के प्रगतिशील कथाकार यशपाल द्वारा लिखित एक तीखे व्यंग्य से भरपूर कहानी पर आधारित है। छात्र इसमें जानते हैं कि कैसे रेलगाड़ी में एक नवाबी ठाठ-बाट वाले सज्जन दो खीरे अपने सामने रखकर बड़े शान से बैठे हैं और उन्हें काटकर खाने की बजाय सूँघकर और खिड़की से बाहर फेंककर अपनी 'नज़ाकत' का प्रदर्शन करते हैं। यह पाठ बताता है कि यशपाल ने इस छोटे-से दृश्य के माध्यम से उस पतनशील नवाबी संस्कृति पर करारा व्यंग्य किया है जो वास्तविकता से कटकर केवल दिखावे में जीती है। छात्र व्यंग्य-विधा, सामाजिक पाखंड की आलोचना और कहानी में प्रतीकात्मकता के विषय में सीखते हैं।
पाठ 10 - एक कहानी यह भी (मन्नू भंडारी)
यह पाठ हिंदी की प्रमुख कथाकार मन्नू भंडारी की आत्मकथात्मक रचना पर आधारित है। छात्र इसमें जानते हैं कि कैसे उनके पिता का व्यक्तित्व, जो एक साथ महत्वाकांक्षी, प्रेरक और दमनकारी था, ने उनके बचपन और युवावस्था को गहराई से प्रभावित किया और कैसे उन्होंने उस छाया से बाहर निकलकर अपनी लेखकीय पहचान बनाई। यह पाठ बताता है कि आज़ादी के आंदोलन की उत्तेजना ने उनके कॉलेज-जीवन को किस तरह दिशा दी। इसमें स्त्री के आत्म-निर्माण और पारिवारिक दबाव के बीच संघर्ष का एक अत्यंत प्रामाणिक चित्रण है। छात्र आत्मकथात्मक गद्य, स्त्री-अस्मिता और पीढ़ीगत संघर्ष के विषय में सीखते हैं।
पाठ 11 - नौबतखाने में इबादत (यतींद्र मिश्र)
यह पाठ यतींद्र मिश्र द्वारा शहनाई के अमर साधक उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ पर लिखित एक अत्यंत जीवंत व्यक्तित्व-चित्रण है। छात्र इसमें जानते हैं कि कैसे बिस्मिल्लाह खाँ ने बचपन से ही शहनाई को अपनी इबादत बना लिया और जीवन भर गंगा और बनारस के प्रति अपना प्रेम कभी कम नहीं होने दिया। यह पाठ बताता है कि उनके लिए शहनाई बजाना केवल कला नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक साधना थी और विश्व-मंच पर जाने के बाद भी काशी की मिट्टी की अनुभूति उनके भीतर सदा जीवित रही। इसमें भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब और एक महान कलाकार की सादगी का अत्यंत भावपूर्ण चित्रण है। छात्र जीवनी-विधा, भारतीय शास्त्रीय संगीत और सांप्रदायिक सौहार्द के विषय में सीखते हैं।
पाठ 12 - संस्कृति (भदंत आनंद कौसल्यायन)
यह पाठ विद्वान बौद्ध भिक्षु भदंत आनंद कौसल्यायन द्वारा लिखित एक विचारोत्तेजक निबंध है जो 'सभ्यता' और 'संस्कृति' के बीच के अंतर को तर्क और उदाहरणों से स्पष्ट करता है। छात्र इसमें जानते हैं कि लेखक के अनुसार मनुष्य ने जो भी नई खोजें की हैं वे सभ्यता के उपकरण हैं, परंतु जिस मानसिक प्रेरणा और जिज्ञासा ने उन्हें खोज करने के लिए प्रेरित किया वही संस्कृति है। यह पाठ बताता है कि इसीलिए खोज करने वाला सांस्कृतिक दृष्टि से महान है परंतु केवल उसका उपभोग करने वाला नहीं। इसमें बौद्ध-चिंतन की गहराई से उपजी एक ऐसी विचार-यात्रा है जो पाठक को अपनी जीवन-दृष्टि पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करती है। छात्र विचारात्मक निबंध-विधा, सभ्यता बनाम संस्कृति का दार्शनिक भेद और सृजनशीलता के महत्व के विषय में सीखते हैं।
कृतिका भाग 2
पाठ 1 - माता का आँचल (शिवपूजन सहाय)
यह पाठ शिवपूजन सहाय द्वारा लिखित एक स्मृति-आधारित संस्मरण-कथा पर आधारित है। छात्र इसमें जानते हैं कि कैसे एक बालक के पिता उसे बहुत प्यार करते हैं और पिता-पुत्र के बीच अत्यंत घनिष्ठ संबंध है, परंतु जब वह बालक अचानक किसी दुर्घटना से घबरा जाता है तो वह पिता की बाँहों को छोड़कर सीधे माँ के आँचल में दुबक जाता है। यह पाठ बताता है कि माँ का आँचल एक ऐसी शरण-स्थली है जो बच्चे को सबसे अधिक सुरक्षित महसूस कराती है, पिता का प्रेम चाहे कितना भी गहरा हो, माँ के आँचल का स्थान उसमें नहीं ले सकता। इसमें अवधी लोक-जीवन और ग्रामीण बाल्यकाल का सुंदर चित्रण है। छात्र संस्मरण-विधा, मातृ-शक्ति और बाल-मनोविज्ञान के विषय में सीखते हैं।
पाठ 2 - साना-साना हाथ जोड़ि… (मधु कांकरिया)
यह पाठ मधु कांकरिया द्वारा लिखित एक संवेदनशील यात्रा-वृत्तांत पर आधारित है जो सिक्किम और गंगटोक की यात्रा के अनुभवों को हृदयस्पर्शी भाषा में प्रस्तुत करता है। छात्र इसमें जानते हैं कि कैसे लेखिका वहाँ की प्राकृतिक सुंदरता, कंचनजंगा की बर्फीली चोटियाँ, झरने और बादलों से ढकी घाटियाँ, से अभिभूत होती हैं और साथ ही वहाँ के लोगों की सरलता और प्रकृति के साथ उनके जीवंत संबंध को गहराई से महसूस करती हैं। यह पाठ बताता है कि 'साना-साना हाथ जोड़ि' एक स्थानीय प्रार्थना का अंश है जिसमें उस पहाड़ी जीवन की विनम्रता और कृतज्ञता की आत्मा समाहित है। छात्र यात्रा-वृत्तांत विधा, पर्यावरण-संवेदना और भारत की भौगोलिक विविधता के विषय में सीखते हैं।
पाठ 3 - मैं क्यों लिखता हूँ? (अज्ञेय)
यह पाठ प्रयोगवादी आंदोलन के प्रवर्तक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' द्वारा लिखित एक दुर्लभ आत्म-विश्लेषणात्मक निबंध पर आधारित है। छात्र इसमें जानते हैं कि कैसे अज्ञेय इस प्रश्न से जूझते हैं कि एक लेखक लिखता क्यों है, क्या यश के लिए, पैसे के लिए या किसी आंतरिक बाध्यता के कारण। यह पाठ बताता है कि अज्ञेय का निष्कर्ष है कि लेखन एक ऐसी आंतरिक विवशता है जो तब तक चैन नहीं लेने देती जब तक वह भाव जो मन में उठा है, काग़ज़ पर उतर न जाए। इसमें एक महान लेखक की रचना-प्रक्रिया को लेकर की गई ईमानदार और जटिल आत्म-पड़ताल है। छात्र आत्मपरक निबंध-विधा, सृजनात्मकता का मनोविज्ञान और लेखन के उद्देश्य के विषय में सीखते हैं।
Hindi Course B:
स्पर्श भाग 2
पाठ 1 - साखी (कबीर)
यह पाठ मध्यकालीन निर्गुण भक्ति-आंदोलन के महान संत-कवि कबीरदास द्वारा रचित साखियों का संकलन है। छात्र इसमें जानते हैं कि साखी का अर्थ है 'साक्षी', वह दोहा जो आँखों देखी सच्चाई का साक्ष्य देता है। यह पाठ बताता है कि कबीर ने अपनी साखियों में ईश्वर को मंदिर-मस्जिद में नहीं बल्कि हृदय में खोजने का संदेश दिया है और जाति-धर्म के भेदभाव को पाखंड बताकर सार्वभौमिक मानवता का उद्घोष किया है। इसमें सधुक्कड़ी भाषा की सहजता और हर दोहे में छिपी गहरी जीवन-दृष्टि का परिचय मिलता है। छात्र निर्गुण भक्ति धारा, सामाजिक समभाव, आत्म-शुद्धि और कबीर की काव्य-भाषा के विषय में सीखते हैं।
पाठ 2 - पद (मीराबाई)
यह पाठ मध्यकालीन भक्ति-आंदोलन की अमर संत कवयित्री मीराबाई द्वारा रचित पदों का संकलन है जो श्रीकृष्ण के प्रति उनकी अनन्य भक्ति और समर्पण को अभिव्यक्त करते हैं। छात्र इसमें जानते हैं कि कैसे मीरा ने राजघराने की सुख-सुविधाओं और सामाजिक बाधाओं को तुच्छ मानते हुए श्रीकृष्ण को ही अपना सर्वस्व मान लिया। यह पाठ बताता है कि मीरा के पद ब्रजभाषा और राजस्थानी मिश्रित भाषा में हैं जिनमें गहरा भावनात्मक आवेग है और जो भक्ति-रस की अद्वितीय अनुभूति कराते हैं। इसमें मीरा की आध्यात्मिक साहस और सामाजिक रूढ़ियों के विरुद्ध उनके विद्रोह का अनुपम चित्रण है। छात्र भक्ति साहित्य की परंपरा और आत्मिक समर्पण के विषय में सीखते हैं।
पाठ 3 - मनुष्यता (मैथिलीशरण गुप्त)
यह पाठ राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित एक प्रेरणादायक और मानवतावादी कविता पर आधारित है। छात्र इसमें जानते हैं कि कवि उन लोगों को वास्तव में मनुष्य मानने से इनकार करते हैं जो केवल अपने लिए जीते और मरते हैं, उनके अनुसार सच्ची मनुष्यता उसी में है जो दूसरों के लिए जीता है, त्याग करता है और मृत्यु के बाद भी याद रखा जाता है। यह पाठ बताता है कि दधीचि, कर्ण और उशीनर जैसे पौराणिक पात्रों के उदाहरण देकर कवि परोपकार को मानव-जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य बताते हैं। इसमें द्विवेदी युगीन हिंदी कविता की नैतिक और उपदेशात्मक शैली का सुंदर परिचय मिलता है। छात्र मानवतावाद, परोपकार की भावना, पौराणिक संदर्भों का काव्य-प्रयोग और राष्ट्रकवि की काव्य-दृष्टि के विषय में सीखते हैं।
पाठ 4 - पर्वत प्रदेश में पावस (सुमित्रानंदन पंत)
यह पाठ छायावादी काव्य के प्रमुख स्तंभ सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित एक अत्यंत चित्रात्मक प्रकृति-कविता पर आधारित है। छात्र इसमें जानते हैं कि कैसे कवि ने पर्वतीय क्षेत्र में वर्षा-ऋतु के दृश्यों को इतनी सूक्ष्मता और कलात्मकता से चित्रित किया है कि पर्वत, झरने, बादल, धुंध और हरियाली सब मिलकर एक जीवंत चित्र बन जाते हैं। यह पाठ बताता है कि पंत ने पर्वत को महाकाय व्यक्ति, झरनों को उसकी भुजाएँ और बादलों को उसकी चादर जैसे मानवीय रूपकों से सजाकर एक अद्भुत काव्य-दृश्य रचा है। इसमें छायावाद की प्रकृति-प्रेम की परंपरा और मानवीकरण अलंकार के विशिष्ट प्रयोग का परिचय मिलता है। छात्र छायावादी काव्य-सौंदर्य, प्रकृति-चित्रण और अलंकार-योजना के विषय में सीखते हैं।
पाठ 5 - तोप (वीरेन डंगवाल)
यह पाठ समकालीन हिंदी कविता के महत्वपूर्ण कवि वीरेन डंगवाल द्वारा रचित एक व्यंग्यात्मक और ऐतिहासिक कविता पर आधारित है। छात्र इसमें जानते हैं कि कानपुर के कंपनी बाग में रखी हुई 1857 के युद्ध की एक पुरानी तोप को देखते हुए कवि उपनिवेशवाद की क्रूरता और अंग्रेज़ी राज की दमनकारी शक्ति का स्मरण करते हैं। यह पाठ बताता है कि आज वही तोप जिससे कभी क्रांतिकारियों को कुचला जाता था, अब बच्चों के खेल का साधन बन गई है और उसके ऊपर गौरैया चहचहाती है, यह प्रतीक बताता है कि अत्याचार की शक्ति अंततः इतिहास का एक बेजान टुकड़ा बन जाती है। छात्र व्यंग्य-काव्य, उपनिवेशवाद का प्रतिरोध, ऐतिहासिक चेतना और काव्य में प्रतीक-प्रयोग के विषय में सीखते हैं।
पाठ 6 - कर चले हम फ़िदा (कैफ़ी आज़मी)
यह पाठ हिंदी-उर्दू के महान प्रगतिशील शायर कैफ़ी आज़मी द्वारा 1964 की हिंदी फिल्म 'हक़ीकत' के लिए लिखे गए एक अत्यंत ओजस्वी देशभक्ति गीत पर आधारित है। छात्र इसमें जानते हैं कि यह गीत 1962 के भारत-चीन युद्ध की पृष्ठभूमि में लिखा गया था और इसमें मातृभूमि की रक्षा के लिए प्राण न्यौछावर करने वाले सैनिकों की वीरता और बलिदान का अत्यंत मार्मिक और ओजस्वी वर्णन है। यह पाठ बताता है कि 'कर चले हम फ़िदा जान-ओ-तन साथियों' की पंक्तियाँ हर पाठक के हृदय में देशभक्ति की ज्वाला जला देती हैं और सैनिकों का देश के प्रति संदेश, 'तुम सजाते ही रहना नए काफिले', एक अमर विरासत है। छात्र वीर रस, देशभक्ति काव्य, हिंदी-उर्दू की साझी साहित्यिक परंपरा और काव्य में भावनात्मक आह्वान के विषय में सीखते हैं।
पाठ 7 - आत्मत्राण (रवींद्रनाथ ठाकुर)
यह पाठ विश्वकवि और नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ ठाकुर की एक प्रसिद्ध बांग्ला कविता का हिंदी अनुवाद है। छात्र इसमें जानते हैं कि 'आत्मत्राण' का अर्थ है, अपनी आत्मा की रक्षा स्वयं करना। इसमें कवि ईश्वर से यह नहीं माँगता कि मुसीबत और संकट न आएँ बल्कि यह माँगता है कि संकट आने पर उसमें उन्हें झेलने की शक्ति हो। यह पाठ बताता है कि यह कविता ईश्वर से सुरक्षा की भिक्षा नहीं बल्कि आत्म-बल और साहस की प्रार्थना है, 'विपद से रक्षा करो यह न मेरी प्रार्थना / बल दो सहन कर सकूँ यह मन की भावना।' इसमें रवींद्र-दर्शन की आत्मनिर्भरता और भारतीय अध्यात्म की मानवतावादी परंपरा का सुंदर समन्वय है। छात्र अनुवाद-साहित्य, आत्मनिर्भरता का दर्शन और प्रार्थना-काव्य की परंपरा के विषय में सीखते हैं।
पाठ 8 - बड़े भाई साहब (प्रेमचंद)
यह पाठ कथा-सम्राट प्रेमचंद द्वारा लिखित एक अत्यंत रोचक और हास्यपूर्ण कहानी पर आधारित है। छात्र इसमें जानते हैं कि कैसे एक छोटा भाई जो पढ़ाई में कम और खेल-कूद में अधिक ध्यान देता है, अपनी कक्षाओं में पास होता रहता है, जबकि उसका बड़ा भाई जो दिन-रात किताबों में डूबा रहता है, बार-बार फेल होता है। यह पाठ बताता है कि बड़े भाई साहब फिर भी छोटे भाई को जीवन के अनुभव और बड़े होने की जिम्मेदारी के आधार पर सलाह और डाँट देते रहते हैं, और कहानी का अंत इस गहरे व्यंग्य के साथ होता है कि पद और उम्र से बड़े होने और वास्तव में ज्ञानी होने में फर्क होता है। इसमें प्रेमचंद की हास्य-शैली और शैक्षिक व्यवस्था पर व्यंग्य का सुंदर उदाहरण मिलता है। छात्र पारिवारिक संबंध, शिक्षा का वास्तविक अर्थ और प्रेमचंद की कथा-शैली के विषय में सीखते हैं।
पाठ 9 - डायरी का एक पन्ना (सीताराम सेकसरिया)
यह पाठ हिंदी के सुप्रसिद्ध डायरी-लेखक सीताराम सेकसरिया द्वारा लिखित एक ऐतिहासिक और भावपूर्ण डायरी-अंश पर आधारित है। छात्र इसमें जानते हैं कि यह 26 जनवरी 1931 को कोलकाता में पहली बार तिरंगा फहराने के उस ऐतिहासिक आयोजन का जीवंत प्रत्यक्षदर्शी विवरण है जो ब्रिटिश प्रशासन को चुनौती देने का साहसिक प्रयास था। यह पाठ बताता है कि कैसे हज़ारों लोग लाठी और गोली की परवाह किए बिना एकत्रित हुए और जब पुलिस ने बर्बर लाठीचार्ज किया तब भी लोगों के हौसले नहीं टूटे और तिरंगा ऊँचा रहा। इसमें डायरी विधा की विशेषताओं, तिथि-वार लेखन, व्यक्तिगत दृष्टिकोण और तात्कालिकता, का व्यावहारिक परिचय होता है। छात्र स्वतंत्रता-आंदोलन का इतिहास, डायरी-विधा और नागरिक साहस के विषय में सीखते हैं।
पाठ 10 - तताँरा-वामीरो कथा (लीलाधर मंडलोई)
यह पाठ कथा-सम्राट प्रेमचंद द्वारा लिखित कहानी पर आधारित है, जो देवगढ़ रियासत में नए दीवान के चुनाव की एक अनोखी कहानी प्रस्तुत करती है। छात्र इसमें जानते हैं कि कैसे बूढ़े दीवान सरदार सुजानसिंह अपने स्थान पर एक योग्य व्यक्ति को चुनने के लिए स्वयं एक लाचार किसान का रूप धारण करकर सभी उम्मीदवारों की परीक्षा लेते हैं। यह पाठ बताता है कि कैसे अधिकांश उम्मीदवार किसान की सहायता को नज़रअंदाज़ कर देते हैं, जबकि केवल पंडित जानकीनाथ ही निःस्वार्थ भाव से उनकी सहायता करते हैं। इसमें अंत में जानकीनाथ को ही नया दीवान घोषित किया जाता है। छात्र सीखते हैं कि किसी भी पद के लिए केवल डिग्री और बाहरी योग्यता ही पर्याप्त नहीं होती, बल्कि चरित्र, दया और कर्तव्यनिष्ठा का अधिक महत्व होता है।
पाठ 11 - तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र (प्रहलाद अग्रवाल)
यह पाठ हिंदी के प्रतिष्ठित कवि-लेखक लीलाधर मंडलोई द्वारा अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह की एक प्रसिद्ध लोककथा के आधार पर लिखी गई एक मार्मिक प्रेम-कहानी पर आधारित है। छात्र इसमें जानते हैं कि कैसे तताँरा नाम का एक वीर और नेक युवक वामीरो नामक एक सुंदर लड़की से गहरी मोहब्बत करता है, परंतु उनके गाँव अलग-अलग होने के कारण कबीलाई नियमों के अनुसार उनका विवाह संभव नहीं। यह पाठ बताता है कि जब तताँरा इस अन्यायपूर्ण नियम के विरुद्ध विद्रोह करता है तो उसकी तलवार से द्वीप के दो टुकड़े हो जाते हैं और दोनों प्रेमियों की मृत्यु हो जाती है, यही कथा आज अंडमान-निकोबार के लिटिल अंडमान और कार-निकोबार के अलगाव की पौराणिक व्याख्या बन गई है। छात्र लोककथा-साहित्य, प्रेम और सामाजिक वर्जनाओं का द्वंद्व और द्वीपीय संस्कृति के विषय में सीखते हैं।
पाठ 12 - अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले (निदा फ़ाज़ली)
यह पाठ हिंदी-उर्दू के सुप्रसिद्ध शायर और गद्यकार निदा फ़ाज़ली द्वारा लिखित एक विचारपूर्ण और पर्यावरण-चेतना से युक्त निबंध पर आधारित है। छात्र इसमें जानते हैं कि कैसे लेखक बचपन की उन यादों को ताजा करते हैं जब मनुष्य और प्रकृति के बीच एक सहज और आत्मीय रिश्ता था, घरों में पेड़ होते थे, पक्षी आते थे और हर जीव के साथ एक भावनात्मक जुड़ाव था। यह पाठ बताता है कि आधुनिक विकास और शहरीकरण ने इस रिश्ते को तोड़ दिया है और मनुष्य इतना स्वार्थी हो गया है कि अब वह केवल अपने दुख से दुखी होता है, दूसरों के, चाहे वे मनुष्य हों या पशु-पक्षी, दुख से नहीं। इसमें मानवीय संवेदना के क्षरण और पर्यावरण-विनाश के बीच के गहरे संबंध को बहुत मार्मिक ढंग से उजागर किया गया है। छात्र पर्यावरण-चेतना, मानवीय संवेदना, सह-अस्तित्व और आधुनिकता की आलोचना के विषय में सीखते हैं।
पाठ 13 - पतझर में टूटी पत्तियाँ (रवींद्र केलेकर)
यह पाठ गोवा के प्रसिद्ध कोंकणी-हिंदी लेखक रवींद्र केलेकर द्वारा लिखित दो लघु-संस्मरणों, 'गिन्नी का सोना' और 'झेन की देन', का संकलन है। छात्र इसमें जानते हैं कि 'गिन्नी का सोना' में लेखक शुद्ध आदर्शवाद और व्यावहारिक आदर्शवाद के बीच के अंतर को गिन्नी के सोने के उदाहरण से समझाते हैं, जैसे शुद्ध सोना बहुत कोमल होता है और उसे टिकाऊ बनाने के लिए थोड़ा तांबा मिलाना पड़ता है, वैसे ही आदर्शों को व्यावहारिकता के साथ जोड़ना पड़ता है। यह पाठ बताता है कि 'झेन की देन' में जापान के एक अत्यंत व्यस्त और तनावग्रस्त आधुनिक समाज और वहाँ की पारंपरिक 'टी-सेरेमनी' के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि आंतरिक शांति और वर्तमान क्षण में जीने की कला ही सच्ची समृद्धि है। छात्र लघु-निबंध विधा, जीवन-दर्शन, आदर्शवाद की व्यावहारिकता और पूर्वी दर्शन की आधुनिक प्रासंगिकता के विषय में सीखते हैं।
पाठ 14 - कारतूस (हबीब तनवीर)
यह पाठ हिंदी रंगमंच के महान नाटककार हबीब तनवीर द्वारा लिखित एक ऐतिहासिक एकांकी नाटक पर आधारित है जो 1857 की क्रांति के महान योद्धा वज़ीर अली की वीरता और चातुर्य को जीवंत करता है। छात्र इसमें जानते हैं कि कैसे अंग्रेज़ अफसर वज़ीर अली को पकड़ने के लिए जंगल में डेरा डाले बैठे हैं और तभी अचानक एक घुड़सवार उनके खेमे में आता है, अंग्रेज़ अफसर से कारतूस माँगता है और वे देने पर मजबूर हो जाते हैं, और तब पता चलता है कि वह स्वयं वज़ीर अली था जो अंग्रेज़ों को मुँह चिढ़ाकर चला गया। यह पाठ बताता है कि यह घटना वज़ीर अली के अदम्य साहस और बेमिसाल आत्म-विश्वास का प्रतीक है जो शत्रु के खेमे में जाकर भी निर्भीक रहा। इसमें एकांकी विधा की नाटकीय कसावट और हिंदी रंगमंच की भाषा का सुंदर परिचय मिलता है। छात्र ऐतिहासिक एकांकी, वीरता और स्वाभिमान, 1857 की क्रांति और नाट्य-साहित्य की विशेषताओं के विषय में सीखते हैं।
संचयन भाग 2
पाठ 1 - हरिहर काका
यह पाठ हिंदी के प्रमुख ग्रामीण-जीवन के कथाकार मिथिलेश्वर द्वारा लिखित एक मार्मिक और सामाजिक यथार्थ की कहानी पर आधारित है। छात्र इसमें जानते हैं कि कैसे हरिहर काका एक बूढ़े, निःसंतान और सम्पत्तिशाली किसान हैं जिन पर एक ओर उनके भाई का लोभी परिवार और दूसरी ओर धर्म के नाम पर ज़मीन हड़पने की फिराक में बैठा महंत, दोनों अपना दबाव बनाए रखते हैं। यह पाठ बताता है कि हरिहर काका इन दोनों के बीच पिसते रहते हैं, जब वे संपत्ति महंत को देने की ओर झुकते हैं तो परिवार उन्हें मारता-पीटता है और जब परिवार की ओर झुकते हैं तो महंत उनका अपहरण करा देता है। इसमें भारतीय गाँव में बुज़ुर्गों की असहायता, धर्म और परिवार के नाम पर होने वाले शोषण का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण है। छात्र ग्रामीण यथार्थ, बुज़ुर्गों की स्थिति, सामाजिक शोषण और कहानी में नैरेटर की भूमिका के विषय में सीखते हैं।
पाठ 2 - सपनों के से दिन (गुरदयाल सिंह)
यह पाठ पंजाबी साहित्य के महान उपन्यासकार गुरदयाल सिंह की एक आत्मकथात्मक कहानी का हिंदी अनुवाद है जो स्कूली जीवन के उन मासूम और यादगार दिनों को जीवंत करती है। छात्र इसमें जानते हैं कि कैसे लेखक गाँव के एक साधारण स्कूल में पढ़ने वाले उन बच्चों के जीवन का चित्रण करते हैं जो पढ़ाई में कम और खेत-खलिहान की जिंदगी में अधिक रमे रहते हैं, और जिनके सपने किताबों से नहीं बल्कि जीवन की कच्ची मिट्टी से बने हैं। यह पाठ बताता है कि उस युग के स्कूलों में कड़ी सज़ा और अनुशासन का जो माहौल था उसके बावजूद बचपन के वे दिन एक अनूठे आनंद और अपनेपन से भरे थे जो आगे की ज़िंदगी में फिर नहीं मिले। इसमें भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद के ग्रामीण पंजाब के जीवन का भी मार्मिक चित्रण है। छात्र आत्मकथात्मक कथा-विधा, बाल-मनोविज्ञान, ग्रामीण शिक्षा और विभाजन की पीड़ा के विषय में सीखते हैं।
पाठ 3 - टोपी शुक्ला (राही मासूम रज़ा)
यह पाठ हिंदी के महान उपन्यासकार राही मासूम रज़ा के प्रसिद्ध उपन्यास 'टोपी शुक्ला' के एक अंश पर आधारित है जो बाल-मनोविज्ञान और सांप्रदायिक सौहार्द को एक साथ समेटता है। छात्र इसमें जानते हैं कि कैसे टोपी शुक्ला नाम का एक हिंदू लड़का और इफ्फन नाम का एक मुस्लिम लड़का उस समय की सामाजिक और धार्मिक दीवारों से परे एक गहरी और निश्छल दोस्ती करते हैं। यह पाठ बताता है कि जब इफ्फन का परिवार दूसरे शहर चला जाता है तो टोपी की दुनिया उजड़ जाती है, उसकी यह पीड़ा बताती है कि बच्चों के लिए दोस्ती में धर्म और जाति का कोई स्थान नहीं होता, यह भेदभाव तो बड़े लोग सिखाते हैं। इसमें सांप्रदायिक एकता का संदेश और बच्चों की निर्मल दृष्टि का अत्यंत मार्मिक काव्य-चित्रण है। छात्र उपन्यास-विधा, सांप्रदायिक सौहार्द, बाल-मनोविज्ञान और भारतीय समाज की विविधता में एकता के विषय में सीखते हैं।

